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गुरुवार, 23 जून 2016

नन्ही चिड़िया

नन्ही चिड़िया नीचे आ,
नीचे आकर गीत सुना।
बड़ी धूप है आसमान में,
थोड़ा सा तो ले सुस्ता।।

दूरदेश से उड़कर आयी,
चोंच में दाना भरकर लाई।
चूँ-चूँ कर क्या कह देती है,
जाने क्या क्या कह देती है।
डरती क्यों है मैं हूँ ना।
पेड़ तले ठंडी छाया है,
छाये में आ दाना खा।।
बड़ी धूप है आसमान में,
थोड़ा सा तो ले सुस्ता।।...........1

पल-पल की चंचल वायु में,
दो पल की इस अल्पायु में।
नभ के नीर नयन दर्शन है,
खुशी का मन ही इक उपवन है।
खुश होकर तू चहक ज़रा।
पंखो को आराम जरा दे,
मेरी गोदी में सो जा।।
बड़ी धूप है आसमान में,
थोड़ा सा तो ले सुस्ता।।............2

चुग-चुग कर ये बना घोंसला,
कहाँ से आया इतना होंसला।
दो पर तू भी मार यहाँ पर,
कभी यहाँ पर, कभी वहाँ पर।
उड़ने की तरतीब लगा।
कब तक राह तगेगा राही,
पंख लगा के तू उड़ जा।।
बड़ी धूप है आसमान में,
थोड़ा सा तो ले सुस्ता।...........3


¥ विनोद कुमार यादव "बोध" ¥

मंगलवार, 17 मई 2016

आइना

वो आईने की बाते करते है,
कुछ सच्चाई तो दिखती है।
हम दिशा बदल दे उसकी तो,
मंजर ही बदल सा जाता है।।

जो हमको दिखाने लाये थे,
खुद देख के शायद डर से गए।
अपनी भी छाया के मंजर,
प्रतिविम्ब में वो भी झलक गए।।

रखे थे छुपा के जो खंजर,
वो अपनो पर ही चला दिए।
जब दुश्मन ने ललकारा तो,
अपने ही बंकर जला दिए।।

अब देशभक्त बन गए वो,
गद्दार देश के थे जो कभी।
अब राष्ट्रवाद समझाते है,
चमचे थे गोरो के जो कभी।।

हमसे भक्ति की बात न कर,
हमसे शक्ति की बात न कर।
ये देश अभी भी मेरा है,
इस अभिव्यक्ति की बात न कर।।

नालायको की नालायकी पर,
तू क्यों इतना इतराता है।
तुझको क्या ये भी बोध नहीं,
ये मतला है प्रतिशोध नहीं

©¥ विनोद कुमार यादव "बोध" ¥

बुधवार, 23 मार्च 2016

ये कैसी होली है भैया?

ये कैसी होली है भैया?
ये कैसी होली है भैया?

मैंने जो लगाया रंग लाल,
तो हो गए वो पीले औ लाल,
कहते है क्या तुम करते हो,
तुम वामपंथ सेे लगते हो।
ये कैसी ठिठोली है भैया?
ये कैसी होली है भैया?

रंग केसरिया जो लगा दिया,
बेवजह ही उनको जगा दिया।
वो असहिष्णु भी कहने लगे,
हम रामभक्त से लगने लगे।
क्या आँख-मिचोली है भैया?
ये कैसी होली है भैय्या?


जब मुठ्ठी हरे से भरने लगी,
सौ उँगली मुझ पर उठने लगी।
अपने ही वतन में अपनो की,
भक्ती की बोली लगने लगी।
ये कैसी बोली है भैया?
ये कैसी होली है भैया?

नीले का असर तो ऐसा था,
सब छुआ-छूत के जैसा था।
हम कदम-कदम,वो चार कदम
सब स्वप्न भूत के जैसा था।
क्या ये ही होली है भैया!
ये कैसी होली है भैया?

सब भांग का दोष नहीं होता,
यहाँ स्वांग का कोष नहीं होता।
सब राजनीति के मंचक है,
यहाँ देश का होश नहीं होता।
ऐसीे क्या होली है भैया?
ये कैसी होली है भैया?

क्या रंग लगाना ऐसे में,
जो दिलो का रंग उड़ा ही दे।
बस श्वेत शान्ति का रंग सही
ये ब्रह्माण्ड को बता ही दे।
ये प्यार की बोली है भैया।
ऐसी ही होली है भैया।।

(C)विनोद बोध

रविवार, 6 मार्च 2016

क्या हुआ, मिलती नहीं तुम

क्या हुआ, मिलती नहीं तुम,
मुझको अब, दिखती नहीं तुम।
धड़कनो में बसकर भी,
धड़कने, सुनती नहीं तुम।।

जब से तुमसे प्यार हुआ,
और ये घर संसार हुआ।
दिल में घुसकर रहती हो,
मेरी इक, सुनती नहीं तुम।।

क्या हुआ, मिलती नहीं तुम,
मुझको अब, दिखती नहीं तुम।...........1

पहले तुम ही कहती थी,
पलको में ही रहती थी।
अब तो ये हालत हो गयी,
मेरी भी, लगती नहीं तुम।।

क्या हुआ, मिलती नहीं तुम,
मुझको अब, दिखती नहीं तुम।.........2

दरवाजे पर देखो कौन,
हर मौके पर देखो मौन।
जीवन की इस भागदौड में,
थक कर भी, थकती नहीं तुम।।

क्या हुआ, मिलती नहीं तुम,
मुझको अब, दिखती नहीं तुम।..................3

घर में इतनी व्यस्त हुयी,
प्यार मोहब्बत ध्वस्त हुयी।
सावन हो या बसंत बहार,
खिलके भी, खिलती नहीं तुम ।।

क्या हुआ, मिलती नहीं तुम,
मुझको अब, दिखती नहीं तुम।..................4

सात जन्म की कसमे भी,
सात वर्ष न ठहर सकी।
साथ निभाना हल्फ सही,
अब साथ, चलती नहीं तुम ।।

क्या हुआ, मिलती नहीं तुम,
मुझको अब, दिखती नहीं तुम।.....................5


तब मुलाकातो पे सवालात,
अब सवालातो पे मुलाक़ात।
मुसलसल जिंदगी भी ए बोध,
मिलकर भी, मिलती नहीं तुम।।

क्या हुआ, मिलती नहीं तुम,
मुझको अब, दिखती नहीं तुम।.....................6


@  ¥   विनोद बोध   ¥       2016/02/27

रविवार, 31 जनवरी 2016

ऐ जी ! सुनो ना....

ऐ जी ! सुनो ना

मैंने बच्चों का नाश्ता बना दिया है।
आप के लिए भी बचा दिया है।।
अब तो बच्चों को जगा दो ना
ऐ जी ! सुनो ना ...........

कुछ तो कर लिया करो।
बच्चों की ड्रेस प्रेस कर लिया करो।।
बच्चों को तैयार कर दो ना
ऐ जी ! सुनो ना........

देखो छोटा वाला रो रहा है।
पापा-पापा ही कह रहा है।।
कुछ देर तो खिला लो ना
ऐ जी ! सुनो ना ............

बिटिया के इम्तहान आ गए है।
कुछ जल्दी ध्यान में आ गए है।।
ज़रा सा तो पढ़ा दो ना
ऐ जी ! सुनो ना..............

आप ने हद कर दी है।
बच्चे ने शू शू कर दी है।।
ज़रा नैपी तो बदल दो ना
ऐ जी ! सुनो ना .............

परसो की पार्टी बहुत अच्छी थी।
कल तो दोस्त ने दे रक्खी थी।।
आज तो होटल से मंगा लो ना
ऐ जी ! सुनो ना ...............

सिसकियो में पिसते अहसास ।
कितने दूर और कितने पास ।।
कभी तो समझा लो ना
ऐ जी ! सुनो ना...............

¥¥ विनोद बोध ¥¥

शनिवार, 23 जनवरी 2016

मैं सोया, तो कुछ लोग जग गए।


मैं सोया,
तो कुछ लोग जग गए।
जिनको जगना था,
वे तो न जगे।
मगर न जाने,
कैसे-कैसे लोग जग गए।।

व्यवस्था को जगाने को,
किसी को सोना भी पड़ता है।
यहाँ पर तो अपनो के लिए,
किसी को खोना भी पड़ता है।
मेरी या अपनी चाहत में,
ऐसे ऐसे लोग लग गए।।
मैं सोया ,
तो कुछ लोग जग गए।।...................1

मेरा सोना भी,
कुछ लोगो को नागँवार लगा।
पर चुप होकर ही
समां खुशगँवार लगा।
मुझे जगाने को
कैसे कैसे लोग लग गए।
मैं सोया,
तो कुछ लोग जग गए।।..............2

सबकी रोटियाँ
अभी भी कच्ची है,
धूप चली गयी,
तो धूप अच्छी है।
सूरज को आइना दिखाने को,
न जाने
ऐसे वैसे लोग लग गए।
मैं सोया,
तो कुछ लोग जग गए।।.............3

मैं मरा,
तो इंसा था,
और मरने के बाद,
क्या क्या था।
मुझे लगा,
कि मरू तो,
सब ठीक हो।
पर कौन मरा,
ये जानने लोग लग गए।।
मैं सोया,
तो कुछ लोग जग गए।।..............4

अब तो ये लगता है,
क्या मरना जरूरी था?
पर मरने के पहले,
जाति, धर्म, बताना जरूरी था।
क्योंकि ये जानने में,
सब लोग लग गए।।
मैं सोया,
तो कुछ लोग जग गए।।........................5

मेरा मरना भी,
क्या मरना हुआ?
कि मरने के पहले,
पीछे कुछ लोग लग गए।।
और मरने के बाद भी,
पीछे कुछ लोग लग गए।।
मुझे इस तरह
लोग ठग गए।।
मैं सोया,
तो कुछ लोग जग गए।।................6

 # विनोद बोध #

सोमवार, 11 जनवरी 2016

मुझे खोकर वो, मेरे जैसा ढूढ़ती है।

मेरे अक्स को वो, कहाँ-कहाँ ढूढती है।
बिखरे अरमानो को, यहाँ-वहाँ ढूढती है।
बयारों की रुबाइयों में बह गए जो,
मुझे खोकर वो, मेरे जैसा ढूढ़ती है।

कोई होगा किसी का , इस क़दर, कहकर,
मुझमें, मेरे बारे में वो क्या ढूढती है।
अपने दर्द का मरहम, दूसरो की ज़ानिब,
सुना है वो, जिंदगी का फलसफा ढूढ़ती है।।
मुझे खोकर वो, मेरे जैसा ढूढ़ती है।।। .........................1

दिल की रंगीनिया और वो मौसम,
यादो में, यादो का, कारंवा ढूढती है।
जिनपे परवान चढी इश्क की हसरत,
आज वो अपनी, हर इक अदा ढूढ़ती है।
मुझे खोकर वो, मेरे जैसा ढूढ़ती है।।...........2

तस्वीर और तसव्वुर तो एक छलावा है,
परछाईयाँ भी क्या, गम के अलावा है।
वक्त की सिलवटों में, न जाने ए बोध,
मेरी फितरत, मेरी चाहत, क्या- क्या ढूढती है।
मुझे खोकर वो, मेरे जैसा ढूढ़ती है।।..........……3

मैंने भी समझ लिया है अबतक,
यादो का बस, आसरा ढूढती है।
जो खो गया उसकी फ़िक्र में बोध,
जो मिल गया उसे, यदा कदा ढूढती है।
मुझे खोकर वो, मेरे जैसा ढूढ़ती है।।.............…4

¥ विनोद बोध ¥